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नोट की ढेरी देखकर सवाल खड़े करने वालों सुनों

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सपने में भी देखा है इतना पैसा कभी

तुममें से ज्यादातर लोग सरकारी नौकरी की चाह किसलिए रखते हो ? जिंदगी आराम से कटे, नौकरी जाने का डर ना हो. बड़ा घर, बागीचा और नौकर हों. दफ्तर लाने ले जाने के लिए सरकारी गाड़ी हो. यानी वो सारी सुख सुविधा हो, जो आईएएस को एक ठसक वाली नौकरी बनाती है. अब कोई ये नहीं बोलेगा कि देश सेवा के लिए आये हैं क्योंकि ऐसा करने  वाले बोलते नहीं है.  

बताओ रुपयों का ढेर किसको अच्छा नहीं लगता ?  सच बताओ क्या ये पैसे देखकर तुम्हारे मन में ख्याल नहीं आ रहा कि नोट का एक बंडल भी पास होता, होगा भी नहीं तुम्हारे पास कभी क्योंकि तुम्हारे पास बेचने को है क्या ? तुम जिस ईमान को बेशकीमती बताये बैठे हो, उसकी कीमत है क्या ? ईमान की कीमत पद और ओहदे से होती है, जितना बड़ा पद उतनी बड़ी कीमत. तुम तो चीख ऐसे रहे हो जैसे तुमने ही कोई खनन का बड़ा काम लिया था और ये पैसे तुमने दान में मैडम को दिये थे.   

अब लॉजिक दोगे कि वो हमारा पैसा है, मजदूरों का पैसा है, गरीबों का पैसा है, हमारा टैक्स, लट पट... भक    अच्छा बताओ, तो  क्या वो पैसा वहां नहीं होता, तो उतने पैसों की ढेरी होती तुम्हारे पास ?  वहां नहीं होता तो कहीं और होता लेकिन तुम्हारे पास तो इसकी फूटी कौड़ी नहीं होता. पैसे की ढेरी देखकर अफसोस मत करो, दुख मत जताओ और ज्ञान भी मत दो. तुम्हें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता और ना ही पड़ना चाहिए, अगर पड़ा भी तो क्या कर लोगे. चाय की टपरी पर चिल्लाओगे, फेसबुक पर ज्ञान बटोगे, सरकार की चिंता करोगे लेकिन तुमसे होगा कुछ नहीं. ना सरकार तुम्हारे कहने से गिरगी, ना सत्ता में बैठे मंत्री ना सरकारी अधिकारी बदलेंगे. बदलेगा कुछ नहीं तो बेकार का लोड मत लो. 

ज्यादा परेशान मत हो, थोड़ा और समझ लो चिंता कम होगी. जो तुम देख रहे हो वो उतना ही है जितना तुम्हारी पॉकिट में चिल्लर होते हैं, सत्ता की सच्चाई देखी कहां है तुमने जो हैरान हो रहे हो. सरकार, बड़े पद या कॉरपोरेट में कोई  दोस्त, रिश्तेदार या कोई अपना हो, तो पूछना उससे कि असल में सत्ता चलती कैसे है ? अगर कोई मिला तो ठीक नहीं मिला तो  तुम इस झूठी शान में जी रहे हो उसी भ्रम में मर भी जाओगे. 

सत्ता पाने, उसे चलाने के लिए जिन चीजों की आवश्यक्ता है ना, तुम कल्पना भी नहीं कर सकते. सच जो तुम देख रहे हो ना उससे कहीं ज्यादा काला है. सबके चेहरे पर कालिख है, बस देखने के लिए तुम्हारे पास वो आंखे नहीं है. कई बार इस कालिख की कोठरी से किसी को धक्के देकर इसलिए निकाल दिया जाता है ताकि उनकी कालिख दिखायी ना दे.  

ज्यादा समझाने की कोशिश तुमको बेकार है, क्योंकि तुम जो समझ रहे हो वो है नहीं, मैं जो समझा रहा हूं वो तुम समझोगे नहीं. तुम्हारी अधूरी समझ ने ही तुम्हें ना समझ बनाकर रखा है, तो वही बनकर रहो अक्सर गड़े खजाने और फेके हुए पैसे पाने का सपना देखने वाले तुम जैसे लोग समझेंगे भी कितना.

Jharkhand Power Crisis : सीएम के घर पेड़ पौधों के लिए भी बिजली और हमारे घर राष्ट्रीय समस्या का अंधेरा

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सीएम आवास 

 हम जैसे लोग जिनके घर में ना एयरकंडिशन है, ना ही इतना बड़ा घर की बागीचे में भी रौशनी चाहिए. एक बल्ब और पंखे के सहारे रात कट जाती है, बिजली की कटौती से ज्यादा परेशान हैं. आज बिजली कटी, तो शहर के एक चक्कर लगाकर लौटा हूं कि मेरी तरह कितने लोग हैं, जिन्हें इस राष्ट्रीय समस्या ने  परेशान  कर रखा है. सड़क के किनारे कई घरों में अंधेरा दिखा. कई जगहों पर लोग छत में, अपनी बालकनी में नजर आये. 


डीसी साहेब का घर 

सीएम हेमंत सोरेन ने ऐसे ही थोड़े ना इसे राष्ट्रीय समस्या बताया हैं. सकंट तो बड़ा है और गर्मी में लोग परेशान भी हैं. देखकर सीएम साहब की बातों पर भरोसा हुआ कि सच में समस्या बड़ी है. सोचा हम सभी घर की छत पर या बाहर अपने घरों में रौशनी के इंतजार में हैं, तो सीएम साहेब भी अपने परिवार के साथ बागीचे में टहलते या मोरहाबादी मैदान के चक्कर मारते मिल जायेंगे आखिर इस राष्ट्रीय समस्या से परेशान तो वो भी होंगे लेकिन ये क्या मुख्यमंत्री आवास पहुंचा, तो देखा कि हमारे हिस्से की रौशनी से तो इनका बागीचा रौशन हो रहा है. दरवाजे पर चमचमाती रौशनी ने साफ बता दिया कि ये इस राष्ट्रीय समस्या से बाहर हैं, अंदर पेड़ पौधों को भी पर्याप्त रौशनी मिल रही है. मुख्यमंत्री आवास के हर कोने में रौशनी है और हम अपने घर के एक कमरे में अंधेरे से परेशान हैं. क्या मुख्यमंत्री इस राषट्रीय समस्या का हिस्सा नहीं है.   

चीफ जस्टिस साहेब का बंगला

मुझे लगा कि भाई मुख्यमंत्री है संभव है इनके लिए अलग इंतजाम होगा. फिर मोरहाबादी में मैं राजकीय अतिथिशाला गया, वहां भी जगमग रौशनी फिर खुद को समझाया कि भइया अतिथि देवो भव :  और भगवान को कोई अंधेरे में थोड़ी ना रखता है.  इसके बाद मैं जिले के मालिक के घर से होकर गुजरा छवि रंजन सर के बाहर का बड़ा सा दरवाजा रौशनी में अपनी छवि तैयार किये बैठा था. बगल में मंत्री जी के आवास में भी रौशनी छनकर सड़क तक आ रही थी. सरकारी अधिकारी और अफसर भी इस

राष्ट्रीय समस्या का हिस्सा नहीं है. चीफ जस्टिस के आवास के पास भी गुजरा वहां भी बिजली की समस्या नहीं थी. आखिर इस राष्ट्र में इस राष्ट्रीय समस्या की जद में कितने लोग हैं और अगर देश के विकास में, देश के हर गर्व के क्षण में इनका हिस्सा है, तो फिर इस समस्या में क्यों नहीं है ? 

नेता जी चंपई सोरेन का घर 

हम अंधेरे में हैं और राज्य से बिजली तैयार होकर दूसरे राज्यों को जा रही है, तो हम इस राष्ट्रीय समस्या को हल करने में कितनी भूमिका निभा रहे हैं औऱ अगर सच में बिजली की इतनी किल्लत है, तो साहेब लोग के घर के साथ- साथ बड़े - बड़े बागीचे और आलीशान और शानदार लैंप जिनकी रौशनी की शायद किसी को जरूरत नहीं फिर जल कैसे रहे हैं. क्या इस राष्ट्रीय समस्या का हल भी हम जैसे साधारण औऱ आम लोगों के हिस्से की रौशनी छिनकर निकलेगा ? तकलीफ उसी को होती है जिसे दर्द होता है. 

इन्हें तो बिजली ना होने और अंधेरे में घंटों बिजला का इंतजार करने का दर्द ही नहीं पता. अगर सीएम, मंत्री औऱ सरकारी आवास में बिजली कटे और कभी- कभी रात भर ना आये तो इन्हें महसूस हो कि कैसे पेपर मोड़कर पंखा तैयार करके हौकते हुए रात कटती है, सुबह उसी उत्साह के साथ हम जैसे साधारण लोग अपने दफ्तर जाते हैं, काम करते हैं फिर वापस लौटकर इस राष्ट्रीय समस्या से भी लड़ते हैं.  

सिर्फ राशन कार्ड नहीं पेट्रोल सब्सिडी के लिए ये सब भी होना जरूरी है...

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अगर आपके पास भी राशन कार्ड है और आप झारखंड सरकार की तरफ से मिलने वाली पेट्रोल सब्सिडी लेने का मन बना रहे हैं, तो आपके पास दो चीजें होनी चाहिए. एक तो राशन कार्ड और दूसरा दमदार इंटरनेट वाला मोबाइल या लैपटॉप. अगर आपके पास राशन कार्ड है और आप यह आर्टिकल अपने मोबाइल या लैपटॉप में पढ़ रहे हैं, तो मुबारक हो आप योग्य है. 

पेट्रोल सब्सिडी के साथ- साथ राशन कार्ड को लेकर दूसरी खबरें भी चर्चा में है. झारखंड सरकार 1.83 लाख लोगों के राशन कार्ड रद्द करने की तैयारी में है. संभव है कि सरकार की इस पेट्रोल सब्सिडी योजना से और नाम भी सामने आयेंगे. पता चला कि लाल कार्ड वाले साहेब ने बुलेट के लिए सब्सिडी की मांग कर दी. आप भले ही इस योजना में बैठकर खामियां निकालिये लेकिन मुझे ऐसा लगता है जैसे सरकार गरीबों को लाभ देने के लिए नहीं बल्कि सक्षम लोगों से गरीबों के नाम से ली जाने वाली सुविधाएं छिनने के लिए है. 

अभी तक 55000 राशन कार्ड निरस्त किए गए हैं. 70,569 ऐसे लोगों की जांच चल रही है.   राज्य स्तर पर इसके लिए टास्क फोर्स के गठन पर भी विचार किया जा रहा है.  झारखंड सरकार के खाद्य आपूर्ति मंत्री रामेश्वर उरांव ने विधानसभा में बताया कि सरकार ऐसे लोगों की जांच करा रही है. 

 यह छूट आसानी से नहीं मिलने वाली. राशन कार्ड तो सिर्फ एक योग्यता है. इसके साथ- साथ  आपके पास अच्छा मोबाइल जिसमें इंटरनेट चलता हो, अंग्रेजी और हिंदी की अच्छी समझ के साथ- साथ मोबाइल चलाने में दक्षता हो, आधार कार्ड, बैंक अकाउंट नंबर, गाड़ी के जरूरी कागजात तैयार हों और इतना सब हो तो आप अपने राशन कार्ड का रंग जरूर देख लीजिएगा कि आप उस कार्ड के योग्य हैं भी या नहीं. 

इसमें हम आपकी थोड़ी मदद किये देते हैं झारखंड में तीन प्रकार के कार्ड है. लाल, पीला और हरा. 

APL Ration Card – एपीएल राशन कार्ड राज्य के उन लोगो के लिए जारी किया गया है जो गरीबी रेखा से ऊपर जीवन यापन कर रहे है । उन्हें  एपीएल श्रेणी में रखा गया है । झारखण्ड के लोग इस राशन कार्ड के लिए ऑनलाइन अप्लाई कर सकते है ।इस राशन कार्ड के लिए कोई आय निर्धारित नहीं की गयी है ।

BPL Ration Card – बीपीएल राशन कार्ड राज्य के उन लोगो के लिए जारी किये गए है जो लोग गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन कर रहे है ।गरीबी रेखा से नीचे आने वाले परिवारों की वार्षिक आय 10000 रूपये से नीचे होनी चाहिए  |

AAY Ration Card – यह राशन उन लोगो के लिए सरकार द्वारा जारी किये गए है जो लोग बहुत ही ज़्यादा गरीबी में जीवन यापन कर रहे है तथा कोई आय भी निश्चित नहीं है या आय ही नहीं है  वह इस राशन कार्ड के लिए आवेदन कर सकते है |

सवाल है कि बीपीएल और अंत्योदय कार्ड के लोगों के लिए यह योजना कितनी कारगर है. क्या इस कार्ड का उपयोग करने वाले लोग इतने सक्षम है कि वह झारखंड सरकार के इस तरीके का इस्तेमाल करके इसका लाभ ले सकेंगे. रामेश्वर उरांव ने बताया कि राज्य में 65 हजार ऐसे लोग ऐसे हैं जो धान भी बेच रहे हैं और राशन कार्ड का भी लाभ ले रहे हैं. जांच में यह पाया गया है कि इन्होंने 50- 200 क्विंटल से ज्यादा धान बेचा है. 

इनके राशन कार्ड को भी रद्द करने की तैयारी है. 3.38 लाख बीपीएल की श्रेणी में हैं जो लोग अयोग्य हैं और बीपीएल का लाभ ले रहे हैं बाकि सरकार की योजना है अगर आप इसका लाभ लेने के योग्य हैं तो घर बैठे 250 रुपये खराब नहीं है. 

टेलीप्राम्टर प्रधानमंत्री या प्रखर वक्ता नरेंद्र मोदी ?

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देश की राजनीति में प्रखर वक्ताओं की सूची बनायेंगे तो एक नाम नरेंद्र मोदी का रखना ही होगा.  मुझे नहीं लगता कि देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी टेलीप्राम्टर बंद हो जोने के बाद असहज हो जायेंगे. इसमें भी कोई दो राय नहीं है कि पीएम मोदी टेलीप्राम्टर का इस्तेमाल करते हैं. मैं पत्रकार हूं, नयी दौर की पत्रकारिता करता हूं मसलन लिखता भी हूं और दिखता भी हूं. 

कई बार हमें वीडियो बनाते वक्त अहम जानकारियां एक पेपर पर लिखकर साथ रखना पड़ता है.  इतना समझता हूं कि जरूरी आंकड़े, अहम जानकारियां हर बार याद नहीं रहते. हम उस नयी पौध से हैं जो छोटी गलतियों पर सोशल साइट में चटकारे लेना अच्छी तरह जानती है. भले ही इनमे से कुछ लोगों को मंच पर या भीड़ में खड़ा कर दें तो जबां कम पैर ज्यादा हिलेंगे.  

राहुल गांधी के कई भाषण सोशल मीडिया पर वायरल है, पप्पु नाम कई चुनावी सभाओं में भी विरोधियों के जरिये इस्तेमाल किये जा चुके हैं. राजनीति में अवसर की तलाश होती है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने  विश्व आर्थिक मंच (WEF) के दावोस अजेंडा शिखर सम्मेलन को संबोधित करने के दौरान यह मौका अपने विपक्षी पार्टी के लोगों को दे दिया है. 

एक अच्छे वक्ता की क्या पहचान है ? आपकी नजर में इसकी परिभाषा क्या है ? अटल बिहारी वाजपेयी अच्छे वक्ता थे लेकिन कई बार भाषण के वक्त लंबे समय तक चुप रहना( लंबा पॉज़ लेना )कई बार चर्चाओं में रहा. वाजपेयी हर 15 अगस्त को लाल किले से दिया जाने वाला भाषण पढ़कर देते थे. वाजपेयी के निजी सचिव रहे शक्ति सिन्हा से जब इस संबंध में सवाल किया गया तो उन्होंने बताया कि ''वह लाल किले की प्राचीर से कोई चीज़ लापरवाही में नहीं कहना चाहते थे. उस मंच के लिए उनके मन में पवित्रता का भाव था. हम लोग अक्सर उनसे कहा करते थे कि आप उस तरह से बोलें जैसे आप हर जगह बोलते हैं, लेकिन वह हमारी बात नहीं मानते थे.

साफ है कि आपका संबोधन जगह- जगह पर निर्भर करता है कि आप बगैर आंकड़े के बगैर फैक्ट के रैलियों में भाषण दे सकते हैं, अंतरराष्ट्रीय मंच पर नहीं. कुल मिलाकर बात ये कि राजनीति में इस तरह के अवसर की तलाश होती है. आप भी किसी खास पार्टी से जुड़े हैं, किसी खास नेता को पसंद करते हैं तो पक्ष और विपक्ष के इस खेल में शामिल रहिये चटकारे लेते रहिये. 

सड़क और अभिनेत्रियों की गाल...

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इनफान अंसारी और कंगना रनौत 

भारतीय राजनीति में विकास मापने का पैमाना. सड़क, बिजली, पानी जैसी मूलभूत सुविधाओं से हैं. इन सुविधाओं को गिनाने का सबका अपना अंदाज है. कोई रांची के मोरहाबादी मैदान को टाइम्स स्क्वायर बनाने की इच्छा रखता है, तो कोई पेरिस, लंदन की बेहतरीन सड़क पार्क से तुलना करता है लेकिन भारतीय राजनीति में एक  फिक्स्ड फार्मूला है जो हर बार हिट रहा है, सड़क और अभिनेत्रियों के गाल का फार्मूला. झारखंड में इस वक्त यही फार्मूला चर्चे में है.  

झारखंड में बदलते वक्त के साथ हेमामालिनी के गाल की जगह अब कंगना रनौत की गाल ने ले ली है.  राजनीति में सड़क और गाल का रिश्ता पुराना है. बिहार, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, राजस्थान सहित कई राज्यों से होते हुए हेमा मालिनी के गाल जैसी सड़क बनाने की नेताओं की ख्वाहिश अब झारखंड पहुंची है लेकिन अब हेमा मालिनी की जगह ले ली है कंगना रनौत ने. कांग्रेस के विधायक इरफान अंसारी ने सड़क को कंगना रनौत के गाल की तरह बनाने का ऐलान कर दिया. 

इस बयान को लेकर किसी बड़े नेता ने तो कोई खास प्रतिक्रिया नहीं दी लेकिन भाजपा नेता महावीर सिंह ने इरफान को फोन करके यह जरूर पूछ लिया कि हेमा मालिनी की तरह क्यों ?  आप भाभी के गाल की तरह बनाइये. विधायक जी ने इसे भी सरलता से लिया लेकिन ये फोन पर हुई यह बातचीत सोशल मीडिया पर वायरल हो गयी. इरफान खान ने फोन करके आपत्ति जतायी, धमकाया, सब वायरल है. लालू यादव भी बयान देकर चर्चा में रहे थे इरफान भी सुर्खिया बटोर रहे हैं.

झारखंड में इरफान अंसानी के ऐसे कई बयान है जिसकी खूब चर्चा रही है. कई बार अपने बयानों की वजह से सुर्खियां बटोरने वाले डॉ इरफान अंसारी मीडिया की सुर्खियों में बने रहना जानते हैं. अपने बयानों की वजह से पहले भी वह चर्चा में रहे हैं. हिरोईन के गाल की तरह सड़क बनाने का दावा करने की परंपरा लालू प्रसाद यादव ने शुरू की थी. उन्होंने कहा था सड़क ओमपुरी के गाल की तरह हैं, जिन्हें वे हेमा मालिनी की गाल की तरह बना देंगे. लालू यादव हेमा मालिनी को इतना पसंद करते थे कि उन्होंने अपनी बेटी का नाम इनके नाम पर रखा. अब कोई नेता अपनी सबसे पसंदीदा हिरोइन के गाल की तरह सड़क आम जनता को देने की ख्वाहिश रखे और उसकी चर्चा ना हो तो ये बेमानी भी. है. अब बस इतना पता करना है कि इरफान अंसारी भी तो उसी तरह कंगना के इश्क में गिरफ्तार नहीं है जैसै लालू यादव थे. 


मैं कृष्ण बिहारी मिश्रा सर के साथ नहीं पत्रकारिता के साथ खड़ा हूं

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हमारी खबरों का माध्यम क्या होता है ? प्रेस कॉन्फ्रेंस, एजेंसी, प्रेस रिलीज जो खबरें हमतक दौड़ कर चली आती है, उन्हें छोड़ दीजिए क्योंकि जो दिखाया जा रहा है, वह खबर ही नहीं है, जो छुपाया जा रहा है, खबर वो है. असल प्रत्रकारिता  में हमारे सोर्स, सूत्र. जो भी खबरें देते हैं, हम उसमें क्या देखते हैं ? कागज, तस्वीरें और सच्चाई. इन सब की पड़ताल के बाद भी खबर सही लगे, तो प्रकाशित करते हैं. इस पत्रकारिता में रिस्क है लेकिन देश और दुनिया में पत्रकारिता का इतिहास उठा कर देख लीजिए बड़े घोटाले, बड़ी खबरें इसी तरह ब्रेक होती है. 

कृष्ण बिहारी मिश्रा सर ने जो खबर लगायी है, उस तस्वीर में साफ - साफ दवा की एक्सपायर तारीख दिख रही है. दवा में जो बैच नंबर है, दिख रहा है. एक प्राइवेट अस्पताल की लापरवाही का मामला है ये. इस पर प्रशासन  की तरफ से एक चिट्ठी सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है. जिसमें जवाब लिखा गया है कि अस्पताल की तरफ से जो कागज दिखाये गये वो सही पाये गये हैं. आपकी खबर गलत है.

इस जांच में तो तस्वीर गलत नहीं है, अच्छा तो तस्वीरें भी झूठ बोलती हैं, तो वो कौन से कागज थे, जिन्होंने इन तस्वीरों को गलत करार दिया है ?  एकस्पायर दवा को सही बताने वाले कागज कौन से हैं ?  हम सभी पत्रकारों को यह जानने का हक है. कम से कम इसलिए क्योंकि हम भी यह मान लें कि तस्वीरें गलत और भ्रामक जानकारी देती हैं. इस तस्वीर को देखकर कम से कम मुझे तो ये नहीं लग रहा है कि इसके साथ कोई छेड़छाड़ या फोटोशॉप की गयी है.   


यह तो डराने वाली बात हो गयी. ऐसे भी आजकल पत्रकार खबरों के चयन में बड़ी सावधानी बरतते हैं. कोई हिम्मतभी करे, तो एक कागज को आधार बनाकर दूसरा कागज दिखाकर डरा दो. 48 घंटे का वक्त दे दिया कि जवाबदीजिए नहीं तो कार्रवाई करेंगे. जांच कहां हुई कैसे हुई ?  किनकी उपस्थिति में हुई ?  क्या जिस बच्चे को यह वैक्सीन मिली वो मौजूद था. उनका पक्ष पूछा गया ? जिसने खबर प्रकाशित की उससे मदद मांगी गयी कि इस खबर के प्रकाशन के साथ- साथ आपके पास क्या - क्या प्रमाण है दीजिए. इस जांच का आधार क्या था ?ऐसे कई सवाल हैं जो किसी भी पत्रकार के मन में उठेंगे. 

सुनों 2022 तुमसे ये उम्मीद नहीं थी....

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नये साल की शुरुआत... 



साल 2022 तुमसे ढेर सारी उम्मीदें थी. उम्मीद थी बदलते वक्त के साथ हालात बदलेंगे लेकिन साल दर साल जिंदगी कट रही है, वक्त आगे बढ़ रहा है. हम भी बड़े ( बुढ़े) हो रहे हैं, तरीख बदल रही है लेकिन लगता है अच्छा वक्त कहीं ठहर सा गया है.  इस साल का  आगाज भी अच्छा नहीं है. मैं सिर्फ कोरोना के नये वैरिएंट को देखकर नहीं कह रहा, निजी तौर पर भी मैं परेशान रहा हूं. साल की शुरुआत का यह मेरा पहला ब्लॉग है. 31 दिसंबर से मैं अस्पताल के चक्कर लगाता रहा. तीन दिनों तक अपनी कार में ही सोता रहा. साल की शुरुआत कुछ यूं हुई कि पता ही नहीं चला कि कब पिछले साल का सफर छूटा और कब नये साल ने दामन थाम कर आगे बढ़ना शुरू कर दिया. 

कल अस्पताल से लौटा हूं और आज से दफ्तर के काम पर लग गया हूं लेकिन इस बार साल की शुरुआत ना सिर्फ मेरे लिए बल्कि कई लोगों के लिए अच्छी नहीं है. मेरे कई सहयोगी, साथी कोरोना संक्रमण का शिकार हो गये हैं. साल की शुरुआत में बढ़ते मामलों का इतना बढ़ जाना कि वह बिल्कुल मेरे सामने आकर खड़े हो जायें परेशान करता है. 

पुराना साल जैसे जैसे गुजर रहा था तब लगा कि इससे बुरा वक्त अब नहीं आयेगा लेकिन नये साल ने आते ही बता दिया कि सबसे बुरा कुछ नहीं होता. हमेशा खराब वक्त के और खराब होने की गुंजाइश रहती है. कोरोना संक्रमण की पहली और दूसरी लहर में भी इसी तरह का अनुभव था लेकिन साल की शुरुआत में यह अनुभव मुझे डराने लगा है. लोग कहते हैं भविष्य की ज्यादा चिंता नहीं करनी चाहिए लेकिन जिस तरह इस साल की शुरुआत हुई है अभी से चिंता होने लगी है. अगर शुरुआत यह है तो अंजाम क्या होगा ? 

खैर वक्त जैसा भी दिन दिखाये उसकी आंख में आंख डालकर देखना है. वक्त हमेशा ताकतवर रहा है. साल की शुरुआत में ही इस साल ने हमें मजबूत किया है. साल 2022 की शुरुआत ने आते ही यह बता दिया है कि मुझसे ज्यादा उम्मीदें मत रखना.मैं भी गुजरे वक्त की तरह ही हूं. तुमसे ढेर सारी उम्मीदें पाल ली थी मैंने. सोचा था साल बदलेगा तो वक्त बदल जायेगा. जिन खुशियों पर दो सालों से ग्रहण लगा था वापस मिलने लगेगी लेकिन... मुझे अब भी भरोसा है बदलते वक्त के साथ तुम भी बदलोगे 


प्रेस क्लब का चुनाव है, पत्रकारों के लीडर का नहीं

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यह चुनाव प्रेस क्लब का है. पत्रकारों के लिए किसी लीडर का चुनाव नहीं है. मुझे नहीं पता आपके लिए प्रेस क्लब क्या है लेकिन मेरे लिए प्रेस क्लब सिर्फ एक क्लब है. ना मेरे लिए यह कोई ऐसी संस्था है, जो पत्रकारों को नियंत्रण में रख सकती है, ना उनके खिलाफ कोई कार्रवाई कर सकती है, ना सामुहिक रूप से पत्रकारिता पर कोई बड़ा फैसला ले सकती है . क्लब के सदस्यों को लेकर यह फैसला जरूर ले सकती है लेकिन इसमें किसी व्यक्ति, वर्ग, समुदाय, राजनीतिक दल का हित -अहित नहीं जुड़ा हो, अगर हो तो सिर्फ और सिर्फ क्लब का हित हो. आपकी जिम्मेदारी क्लब की है पूरी पत्रकारिता की नहीं. 

प्रेस क्लब का चुनाव क्लब का चुनाव ना हो कर, पूरे पत्रकार समुदाय के साथियों के मसीहा का चुनाव बन गया है. दुख है कि राजनीतिक दल भी इसे इसी तरह देखते हैं, ब्यूरोक्रेट्स भी इसी तरह मानते हैं कि क्लब के अधिकारियों को बुलाकार कुछ समझा दिया, तो रांची के पूरे पत्रकारों को समझा दिया. यही कारण है कुछ को आसानी से फंडिंग भी मिल रही है, खर्च भी उसी तरह हो रहा है. हम अलग- अलग संस्थान में काम करते हैं. हम संस्थान के प्रति जवाबदेह हैं, क्लब के नहीं. ऐसे में किसी को कुछ समझाना हो, तो संस्थान के प्रमुख संपादकों से बात की जानी चाहिए. क्लब के लिए काम करने वाले सदस्यों से नहीं. 

राजनीतिक दल और अधिकारी जो समझते हैं वो समझें लेकिन दुखद है कि चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार भी इसे क्लब का चुनाव ना मानकर पूरी पत्रकार बिरादरी का मुखिया  बनने के फिराक में है. प्रचार भी उसी तर्ज पर हो रहा है. भाईयों स्पष्ट है कि चुनाव के केंद्र में क्लब को रखना है, उसकी सुविधाओं को रखना हो. इस जगह को देश के उन शानदार जगहों में एक बनाना है. जहां हम पत्रकार साथी अपने दूसरे राज्यों से आये साथियों को गर्व से दिखा सकें कि यह हमारा क्लब है. हमारे लिए यह - यह सुविधाएं हैं. 

बात इस शानदार बिल्डिंग के नियंत्रण, सही रणनीति और उचित संचालन की है बस... इसे पत्रकारों के मुखिया के रूप में मत लड़िये. आप जितने भी लोग मैदान में हैं. उन्हें इस बिल्डिंग के सही संचालन की जिम्मेदारी निभानी है. हम जैसे आम सदस्य जब आयें, तो हमें कोई परेशानी ना हो इसका ध्यान रखना है. हम अपने परिवार के साथ, दोस्तों के साथ इस क्लब के सुविधाओं का पूरा लाभ उठा सकेंगे इसके लिए आपका चयन किया जा रहा है. कमरा आसानी से उपलब्ध हो, भोजन की सही व्यस्था हो. हमारे मनोरंजन का साधन हो. इसके लिए आपका चयन हो रहा है.  

आप इस चुनाव में जीतकर मुख्यमंत्री, अफसर या किसी बड़े अधिकारी से मिलते हैं, तो स्पष्ट कीजिए आप पत्रकारों का संचालन, उनकी नीति तैयार नहीं करते. आप यह तय नहीं करते कि क्या छपेगा, क्या नहीं. आप सिर्फ इस बिल्डिंग के संचालन की जिम्मेदारी संभालते हैं. मैंने देखा है कि कई विधायक शिकायत लेकर प्रेस क्लब के चुने अधिकारियों के पास आते हैं, उम्मीद करते हैं उन पर कार्रवाई होगी, रोक लगेगी.

आप होते कौन है कार्रवाई करने वाले, उन्हें लिखने से रोकने वाले. वह आपका सदस्य है इसका अर्थ कतई नहीं है कि वह पत्रकारिता आपके दिखाये रास्ते पर करेगा. वह अपने संस्थान के प्रति जवाबदेह है आपके प्रति नहीं. आप इस बिल्डिंग, इसके सुविधाओं की जिम्मेदारी संभालिये. आप जहां गलत होंगे हम जैसे सदस्य खड़े होंगे आपकी गलती, कमियां गिनाने को. बात रही पत्रकारिता कि तो उसे संभालने की जिम्मेदारी आपके अकेले की नहीं है हम सभी पत्रकारों को मिलकर इसे संभालना है. चुनाव के लिए शुभकामनाएं  

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