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निष्पक्ष पत्रकारिता ?

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पत्रकारिता की शुरुआत में जब विरोध के तौर पर दुध, फल, सब्जियां सड़क पर फेंके जाते थे, तो  लगता था कि इसे गरीबों में क्यों नहीं बांटते ? सड़क पर क्यों फेंक रहे हैं? गुस्सा आता था. फिर धीरे- धीरे बात समझ आयी. 

निष्पक्ष पत्रकारिता 

सरकार, पत्रकार और प्रशासन तक बात पहुंचाने का माध्यम ही यही है, कौन पत्रकार कवर करता कि फसल के सही दाम नहीं मिले, तो अनाज, दुध या फल गरीबों में बांट दिया. अगर कवर भी होता, तो किस नेता, मुख्यमंत्री या प्रशासन को फर्क पड़ता कि सही दाम मिले या नहीं ? लगता चलो, गरीबों का तो भला हुआ. 

ऐसी स्थिति हुई कैसे ? पत्रकारिता की दिशा और खबरों के चयन के लिए क्या सिर्फ संपादक जिम्मेदार होता है ? खबरें कैसे चुनी जाती हैं,जानते हैं आप ? खबरें किसके लिए चुनी जाती हैं ?  

खबरें सिर्फ आपके लिए बनती हैं और खबरों का चयन पूरी तरह इस पर निर्भर करता है कि आप क्या पढ़ना चाहते हैं ? खासकर डिजिटल माध्यम में, जरा हेडलाइन पढ़कर बताइये कौन सी ज्यादा दमदार लग रही है ?

1 फसल की कीमत नहीं मिली, तो किसानों ने गरीबों में बांट दी सब्जी

2  सड़क पर किसानों ने फेंकी सब्जियां, जानें क्या है वजह ? 

3 उर्फी जावेद का नया लुक वायरल, तस्वीर देखकर हैरान रह जायेंगे आप ? 

इस वक्त भले थोड़ा सा भी लग रहा हो कि आप ऊपर वाली हेडलाइन पर क्लिक करेंगे लेकिन यकीन मानिये आपके ऊंगलियां उस खबर पर रूकेंगी ही नहीं. इन्हें आदत हो गयी है. ऊर्फी जावेद के नये लुक को पहले देखने की. दोषी कौन है इस पक्षीय पत्रकारिता का ?

जो जिम्मेदार हैं, वहीं अक्सर पत्रकारों को खेमे में बाटते हैं. ये सरकार के पक्ष में है, ये विरोध में है.अगर इससे भी ज्यादा लोग किसी पत्रकार को समझने लगे, तो राजनीतिक पार्टी से जोड़ते हैं, थोड़ा और समझने लगें, तो खास नेता से और ज्यादा अंदर की जानकारी हो, तो नेता के व्यपार से. 

सवाल है कि सिर्फ पत्रकार ही किसी पक्ष- विपक्ष में है या पूरी पत्रकारिता ही ऐसी है? 

मेरी समझ जो सकती है..  हम कोशिश करते हैं इसे परत दर परत समझा सकें. बड़े अखबार या नोएडा वाले मीडिया हाउस के पत्रकारों की बात छोड़ देते हैं. अपनी समझ अब भी राष्ट्रीय नहीं हुई, हां क्षेत्रीय पत्रकारिता की समझ थोड़ी हो रही है. 

झारखंड में कई छोटी वेबसाइट, जो बड़े पत्रकारों की पहचान के भरोसे चल रही हैं. संचार क्रांति के इस दौर में जहां हर हाथ मोबाइल है. यूट्यूब और वेबसाइट पत्रकारिता एक बड़े विकल्प के रूप में सामने है. इसमें वो लोग शानदार काम कर रहे हैं जिन्हें स्टॉफ की सैलरी, बड़े दफ्तर का किराया, बिजली बिल नहीं भरना पड़ता. 

वो वेबसाइट, गूगल ऐड और फेसबुक से इतना कमा लेते हैं, जितना वो किसी और जगह काम करते, तो कमाते. ऐसे लोगों की अपनी पहचान भी है और आप इनसे ईमानदारी की उम्मीद कर सकते हैं. इनसे उर्फी जावेद के साथ- साथ खेती, किसानी, बेरोजगारी सहित गांव जवाब की बेहतर ग्राउंड स्टोरी की भी उम्मीद की जा सकती है. जो आप पढ़ना चाहते हैं वो भी पढ़ाते हैं और जो पढ़ना चाहिए वो भी पढ़ाते हैं. 

पहचान उनकी भी है ,जो छोटी वेबसाइट के बड़े मालिक हैं. नेताओं के साथ उठना बैठना है. राजनीति में पूरी पकड़ है. नेताओं के इंटरव्यू के साथ- साथ और भी कई परतों में रिश्ते हैं. 

इनकी वेबसाइट, तो छोटी है लेकिन स्टाफ, बिजली बिल, दफ्तर का किराया लाखों के पार है. ऐसे में गूगल - सोशल मीडिया इतने पैसे नहीं देते कि इन सबका खर्च निकले और अपना वेतन भी बचा लिया जाये. सवाल है पैसे आते कहां से है ? 

अगर आप ऐसी छोटी वेबसाइट को छोटा मानकर आंकलन करेंगे,तो बड़ी गलती होगी. इसमें किसी बड़े नेता, बिल्डर, व्यापारी के पैसे लगे होते हैं. पैसे लगाने वाले के अपने हित हैं. ठेका, सरकारी पैरवी और अगर निवेशक नेता जी रहे तो प्रचार, राजनीतिक हित सहित कई चीजें हैं.  

ऐसे कई पत्रकार नेताओं की सोशल मीडिया भी मैनेज करते हैं, नेता के अकाउंट से ट्वीट करते हैं, उनकी खबरें अपने यहां छापते हैं फिर लिंक शेयर करते हैं. साथ ही कई दूसरे पत्रकारों से आग्रह भी करते हैं कि इसे अपने यहां भी जगह दीजिए.  जगह मिली, तो नेता को समझा भी देते हैं कि अपनी सोशल मीडिया का पावर ही ऐसा है. नेता खुश..कंपनी चलती रहती है. खबरों की चिंता कम प्रचार, प्रसार की चिंता अधिक होती है. आप ऐसे समझेंगे नहीं उदाहरण देकर समझाता हूं.. किसी गरीब शोषित को पकड़ते हैं उसकी खबर चलाते हैं, नेता के टि्वटर हैंडल से खुद मदद का भरोसा देते हैं. फिर इसे अपनी वेबसाइट पर खबर के रूप में जगह देते हैं. खबर का असर, मदद का भरोसा जैसी गर्दादार हेडलाइन के साथ. अगर  इसमें उस गरीब का भी कुछ भला होता होगा तो ठीक भी है चलो... लेकिन खबर बेचने वाला  इसे खबर के असर, पत्रकार की धाक और वेबसाइट के बड़े कदम के रूप में बेच देता है. 

समझ रहा है ना विनोद....

पत्रकारों को यह भी समझा दिया जाता है, किसके खिलाफ खबर लिखना है किसके खिलाफ नहीं. कौन मित्र है, किसको टारगेट करके मालिकों को खुश रखना है और नया निवेशक कैसे जोड़ना है. अगर निष्पक्ष का मतलब किसी के पक्ष में होना नहीं है, तो पत्रकारिता चलेगी कैसे और अगर पक्षीय होकर चली तो निष्पक्षता बची कहां? 

 इसे और बेहतर समझा जा सके इसलिए मेरे कुछ सवाल हैं, जवाब आप तर्क के साथ देंगे ऐसी उम्मीद भी है. 

क्या बगैर सहयोग के सिर्फ पांच पत्रकारों की टीम मिलकर सिर्फ ईमानदारी से वेबसाइट चला सकती है ?

विज्ञापन देने वाली संस्था, संगठन या राजनीतिक दल की सही खबर जो उनके लिए नकारात्मक हो परोसी जा सकती हैं ? 

क्या सच में निष्पक्ष पत्रकारिता का कोई मॉडल है ? 

और अगर इन सबके जवाब में निष्पक्षता सवाल के घेरे में आती है, तो इसका जिम्मेदार कौन है ? 

1 पत्रकार

2 निवेशक 

3 जनता 

मेरा जवाब आपने लेख की शुरूआत में पढ़ लिया है, आपके जवाब के इंतजार में अबतक निष्पक्ष रहा पत्रकार 

सरकारी नौकरी : एक दिन के काम पर भी जिंदगी भर पेंशन, योग्यता- कुछ भी चलेगा

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Mp Mla Salary And Pension

एक दिन की भीा नौकरी कर ली,तो जिंदगी भर की राहत. समय पर पेंशन और यात्रा, फोन सहित ढेर सारी सुविधाएं.  कौन सी नौकरी है ? योग्यता क्या है ? योग्यता तो इतनी है कि एक बिल्कुल अयोग्य व्यक्ति भी आवेदन कर सकता है. हर एक व्यक्ति के पास समान अवसर. टाइम पर दफ्तर पहुंचने का लफड़ा नहीं, आप किसी कंपनी या फैक्ट्री के कर्मचारी नहीं होंगे, एक दिन के लिए भी काम किया तो जीवनभर 25 हजार रुपये से ज्यादा की पेंशन. यात्रा भत्ता के साथ कई तरह की सुविधाएं.  है, ना शानदार नौकरी... नौकरी प्राइवेट नहीं है सरकारी है. पद है सांसद या विधायक. अरे पहले फायदे तो पढ़ लीजिए फिर सोचियेगा करना है कि नहीं.  अपने राज्य के आंकड़े से समझाता हूं ,ज्यादा बेहतर समझ सकेंगे. झारखंड में पांच साल पूरा करने वाले विधायकों को 40 हजार रुपए प्रति माह पेंशन राशि निर्धारित है.  एक बार 40 हजार रुपए का पेंशन निर्धारित होते ही प्रति वर्ष उसमें केवल 4 हजार रुपए की वृद्धि होती जाएगी. 

अगर कोई नेता पूर्व सांसद या विधायक की पेंशन ले रहा है इसके बाद वो मंत्री बनता है तो मंत्री पद के वेतन के साथ ही पेंशन.  सांसदों और विधायकों को डबल पेंशन का हक है और सरकारी कर्मचारियों की सिंगल पेंशन स्कीम भी छिन ली गयी. पेंशन के लिए कोई न्यूनतम समयसीमा तय नहीं है, यानी कितने भी समय के लिए नेताजी सांसद रहे हों, पेंशन पाने का पूरा अधिकार है. सांसद या विधायक जी की मौत हो गयी, तो परिवार को आधी पेंशन. पूर्व सांसदों का सेकेंड एसी रेल का सफर मुफ्त. 

सैलरी के अलावा और भी बहुत कुछ

किसी भी सांसद को मिलने वाले पैसे के चार हिस्से होते हैं.  सैलरी, निर्वाचन क्षेत्र के लिए भत्ता, ऑफिस के लिए खर्च और सहायक के लिए वेतन। ट्रैवल अलाउंस महंगाई के हिसाब से बदलता है. कितना मिलता है इससे समझ सकते हैं कि एक नेता के तीन महीने ट्रैवल का बिल 20 लाख रुपये आया था. 2002 तक देश व प्रदेश में  सरकारी क्षेत्र में काम करने वाले हर एक कर्मचारी को पेंशन मिलती थी, लेकिन 2002 के बाद OPS को बंद कर दिया गया बदले में कई जगहों पर आंदोलन हुए तो कई राज्यों ने फैसला लिया पुरानी पेंशन बहाल करने का.  20 राज्य तो ऐसे हैं जो अपने पूर्व विधायकों को किसी सांसद से ज्यादा पेंशन देते हैं. विधानसभा और विधान परिषद के सदस्यों को भी पेंशन मिलती है. जनप्रतिनिधियों को दी जाने वाली पेंशन की व्यवस्था इस देश में नेता और सरकारी कर्मचारियों के बीच के बड़े फर्क को दिखाती है.  ?  ब्रिटेन दुनिया का सबसे पुराना प्रजातंत्र है. वहां के सांसदों को वेतन व पेंशन की सुविधा है, परंतु वहां सांसदों का वेतन, पेंशन निर्धारित करने के लिए एक आयोग का गठन होता है। इस आयोग में विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों को शामिल किया जाता है। इस आयोग को स्थायी रूप से यह आदेश दिया गया है कि सांसदों को इतना वेतन और सुविधाएं न दी जाएं जिससे लोग उसे अपना करियर बनाने का प्रयास करें और न ही उन्हें इतना कम वेतन दिया जाए जिससे उनके कर्तव्य निर्वहन में बाधा पहुंचे.  

1990 और अब कितना बढ़ा वेतन 

'लेजिस्लेटर्स इन इंडिया, सैलरीज एंड अदर फैसिलिटीज' नामक एक पुस्तक में नेताओं के मिलने वाली पेंशन की तुलना की गयी है. साल  1990 में मध्यप्रदेश के विधायकों का मासिक वेतन 1,000 रुपए था. 30,000 रुपए प्रतिमाह है. उस समय निर्वाचन क्षेत्र भत्ता 1,250 रुपए था, अब 35,000 रुपए है.  टेलीफोन भत्ता 1,200 रुपए प्रतिमाह था, आज 10,000 रुपए है. चिकित्सा भत्ता 600 रुपए था अब 10,000 रुपए है. स्टेशनरी भत्ता 10,000 रुपए प्रतिमाह ,  कम्प्यूटर ऑपरेटर/ अर्दली भत्ता 15,000 रुपए मिलता.  कुल 1,10,000 रुपये. सांसदों और विधायकों को एक ऐसा भत्ता भी मिलता है, जो शायद देश तो क्या, दुनिया में भी कहीं नहीं मिलता होगा। प्रत्येक सांसद और विधायक को दैनिक भत्ता मिलता है अर्थात उसे संसद और विधानसभा की दिनभर की कार्यवाही में शामिल होने के लिए दैनिक भत्ता मिलता है. 

सुविधाओं में इतना फर्क क्यों 

देश की अर्थव्यस्था और बेरोजगारी की स्थिति आपको पता ही है. आपने सुना है कि कभी इन पदों में कटौती की गयी है, वेतन में कटौती की गयी या सुविधाओं में कटौती हुई है. नेता की पेंशन तय करने के लिए  संसद में दोनों सदनों की एक संयुक्त समिति बनती है. इसमें राज्यसभा के पांच और लोकसभा के 10 सदस्य होते हैं. पेंशन और सुविधाओं की इस सूची को देखकर आपके मन में सवाल उठ रहा होगा आखिर इसे रोका क्यों नहीं जाता.  पेंशन का मामला इलाहाबाद हाई कोर्ट पहुंचा था. एक गैर सरकारी संस्था ने इस पर सवाल खड़ा करते हुए याचिका दायर की थी. मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा  केस खारिज कर दिया गया. सरकारी कर्मचारी औऱ नेता दोनों जनता की ही सेवा करते हैं फिर इनकी सुविधाओं में इतना फर्क क्यों 

ना मैं नमाजी हूं, ना मैं पुजारी

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ना मैं नमाजी हूं,ना मैं पुजारी, तो फिर मैं कौन हूं ? मामूली सा इंसान हूं. मैं बेवजह टीका या टोपी लगाकार दफ्तर नहीं आता. मैं साधारण सी चेक शर्ट और पैंट पहनता हूं. शनिवार को कभी - कभी टीशर्ट की इच्छा हुई, तो पहन ली लेकिन कॉलर वाली. मैं बिना कॉलर वाली टीशर्ट सिर्फ घर पर पैजामे के साथ पहनता हूं . मैंने ना टिक रखी है, ना चेहरे पर बड़ी - बड़ी दाढ़ी.  आप पहचानते तो हैं मुझे, अरे कई बार तो मिले हैं हम.  सड़क पर ट्रैफिक जाम में हम और आप आस- पास तो खड़े लाल बत्ती के हरे होने का इंतजार कर रहे थे. आपने देखा भी मुझे, मैंने काले रंग की एक बैग जिसमें लंच बॉक्स और लाल रंग की बोतल जिसका आधा पानी खत्म हो चुका था, टांगे रखी थी. 

मैं नाम इसलिए नहीं बता रहूं कि आप मेरे नाम को  किसी भी धर्म या जाति से जोड़कर मुझे देखेंगे फिर मैं, जो कहने जा रहा हूं उसे हिंदू या मुस्लिम के खांचे में रखेंगे फिर मुझे दूसरे खेमे से गालियां मिलेंगी. हां, मैं इतनना जरूर कह सकता हूं, मेरे और ईश्वर का रिश्ता बहुत सरल है. आजतक किसी ने मेरे सामने मेरे ईश्वर के लिए बुरा नहीं कहा, टीवी चैनल, डिबेट या व्हाट्सएप के फॉरवड में ही मैंने अपने ईश्वर के खिलाफ या उनके विरोध में बयानबाजी पढ़ी, सुनी और देखी है. वो इतना ताकतवर है कि उसके हक के लिए मुझे लड़ने की जरूरत नहीं है. ये तो वही बात हो गयी कि खली से मैं कहूं कि आप बैठिये आज रेसलिंग मैं करूंगा... 

 मैं एक साधारण सा इंसान हूं, जो हर सुबह एक तय शिफ्ट पर अपनी नौकरी के लिए निकल जाता है, ईमानदारी से काम करता है, दोस्तों के साथ बेहतरीन वक्त बिताता है, परिवार को समय देता है और हर दिन इसी तरह काटता है. मेरे धर्म की मजबूती का मुझे पता है इसलिए मैं उसके कमजोर होने की चिंता नहीं करता. ऐसा नहीं है कि मैं चिंता नहीं करता बिल्कुल करता हूं  दुध, सब्जी, पेट्रोल, डीजल और खाद्य पदार्थ के दाम बढ़ते हैं, तो चिंता बढ़ जाती है.मैं चिंता करता हूं कि बेहतर इलाज कम पैसे में कैसे मिल पायेगा. मैं चिंता करता हूं, घर का किराया और महीने का खर्च होने के बाद मैं कितने पैसे बचा रहा हूं. हर महीने क्रेडिट कार्ड का बढ़ता बिल कैसे खत्म हो इसकी चिंता है मुझे. नौकरी में हजार तरह की चिंताएं हैं, मेरी चिंताएं दूसरों से अलग है.

मैं चिंता के साथ- साथ  देश की रक्षा में खड़े हर एक जवान का सम्मान करता हूं, मुझे गर्व है कि मैं एक भारतीय हूं। कभी कभी मैं गुस्सा भी करता हूं, नेताओं के आने पर ट्रैफिक पर मुझे रोककर नेताओं की गाड़ियों की स्पीड से नाराज होता हूं. 

मैं शाम को  टीवी डिबेट देखकर अपनी पिछड़ी सोच या कट्टर ना हो पाने का दुख जरूर अपने परिवार से साझा करता हूं. मेरे पास इतना वक्त ही नहीं है कि मैं बेवजह चाय की टपरी पर धर्म की डिबेट में शामिल हो सकूं. किसी रैली में शामिल हो सकूं. मैं सच में बेहद साधारण सा इंसान हूं. अगर आप बेहद खास इंसान है तो अपनी खासियत का सही दिशा में इस्तेमाल कीजिए। सड़क पर दौड़ने में , पत्थर फेंकने में या निशानेबाजी में माहिर हैं तो देश के रत्न है आप भारत के लिए स्वर्ण ला सकते हैं बस इसे स्टेडियम में दूसरे देशों के खिलाड़ियों को हराकर हासिल करना होगा, यकीन मानिये आपको टीवी पर देखकर पूरा देश तालियां बजा रहा होगा। 

पत्रकारिता क्या- क्या मांगती है ? बदले में देती क्या है

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पत्रकारिता बहुत कुछ मांगती है ? आप में से कोई बता सकता है हम इस पेशे में रहने की कीमत कैसे चुकाते हैं ? जब कोई युवा साथी हमें अचानक छोड़कर चले जाते हैं, तो आपके मन में सवाल नहीं उठता ? हम इसे पेशे के लिए क्या दे रहे हैं, कैसे दे रहे हैं, कितना दे रहे हैं ?

पत्रकारिता में इतना व्यस्त रहते हैं कि सही समय पर खाने का वक्त नहीं मिलता, कभी किसी प्रेस कॉन्फ्रेंस में मिली मिठाई की डिब्बी से कुछ खा लिये, तो कभी सड़क पर खड़े होकर एक प्याली चाय से भूख मार दी. घर से जो खाकर निकले वही फिर पता नहीं कि दोपहर और रात के खाने का क्या होगा ? कोई बड़ी खबर नहीं रही सबकुछ ठीक रहा, तो रात का खाना मिला वो भी किसी तय समय पर नहीं. 

ना सोने का वक्त सही, ना जागने का कोई निश्चित समय. भागते - दौड़ते हुए भी शरीर में कई तरह की बीमारियां. किसी को मधुमेह, तो किसी को कोई और परेशानी. इसके बाद भी पत्रकारिता में खुद को इतना झोंक देते हैं कि शरीर के संकेत समझ ही नहीं पाते. 

कई पत्रकारों को देखता हूं शाम में काम खत्म करने के बाद उनकी थकान मिठाने के तरीके अलग है. कई लोगों को शाम में हर दिन शराब चाहिए ही चाहिए.कहीं मिली तो ठीक नहीं मिली, तो एक छोटी बोतल खरीद कर कहीं भी, कैसे भी गटक ली कईयों को लगता है थकान मिट गयी लेकिन शरीर का क्या ? 

इन सबके बावजूद भी हमें मिलता क्या है ? कभी बड़ी खबर ब्रेक करने पर पत्रकार बिरादरी में ही वाहवाही, तारीफ. नेता से जान पहचान का गर्व. कभी किसी बड़े नेता ने पीठ थपथपा दी, तो लगता है जैसे सारे मेहनत का ईनाम मिल गया. संपादक ने तारीख कर दी, तो लगा सब सही है. किसी नयी संस्था या पुराने घाट ने कोई ईनाम दे दिया. एक चादर और सर्टिफिकेट की अच्छा काम कर रहे हो .आप कितने दिन याद रखे जायेंगे, सुबह जिस अखबार का महत्व होता है, शाम में लोग उसी में भूंजा फांकते हैं. 

सवाल है हमें चाहिए क्या ?  हमें अपनी मेहनत, अपनी काबिलियत और क्षमता के आधार पर पैसे चाहिए. समय पर चाहिए ताकि खबरों की परेशानी के साथ- साथ पत्रकार जो दो - तीन महीने वेतन ना मिलने का दर्द लिये घूमते हैं, यही जान लेवा है, इससे बच सकें.  

पत्रकार हित में संस्था बनाने वाले लोग, बड़े - बड़े वादे और दावे करने वाले लोग इस पर चुप रहेंगे क्योंकि कई बड़े लोग ही इन संस्थाओं के मुखिया है. युनियन बनाकर अपनी दुकान चला रहे हैं. अब सबसे जरूरी सवाल- करें क्या ?  बड़े- बड़े अफसर, कभी - कभी पूरी सरकार को अपनी खबरों से हिलाकर रख देने वाले अपने अंदर की कमियों को देखकर भी मौन रहते हैं.

 न्यूनतम मजदूरी पर रिसर्च करके बड़ा आर्टिकल लिखने वाले कई पत्रकारों का वेतन न्यूनतम मजदूरी से कम है. एक मजदूर दिनभर मेहनत करके 500 रुपये कमाता है कई पत्रकारों को इतना भी नहीं मिलता. जो खुद इतने शोषित है, वो करेंगे भी क्या. आप  अफसोस करिये. अपने बीच से किसी के इसी तरह चले जाने का, आप अफसोस कीजिए कि ब्याज की तरह आपकी शरीर में कई तरह की बीमारियां बढ़ रही है, आप अफसोस कीजिए कि किसी पत्रकार के बीमार होने पर आप 500 रुपये से ज्यादा की मदद नहीं कर सकते क्योंकि इससे ज्यादा देने पर आपके घर का बजट हिल जायेगा, आप बस अफसोस कीजिए...

नोट की ढेरी देखकर सवाल खड़े करने वालों सुनों

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सपने में भी देखा है इतना पैसा कभी

तुममें से ज्यादातर लोग सरकारी नौकरी की चाह किसलिए रखते हो ? जिंदगी आराम से कटे, नौकरी जाने का डर ना हो. बड़ा घर, बागीचा और नौकर हों. दफ्तर लाने ले जाने के लिए सरकारी गाड़ी हो. यानी वो सारी सुख सुविधा हो, जो आईएएस को एक ठसक वाली नौकरी बनाती है. अब कोई ये नहीं बोलेगा कि देश सेवा के लिए आये हैं क्योंकि ऐसा करने  वाले बोलते नहीं है.  

बताओ रुपयों का ढेर किसको अच्छा नहीं लगता ?  सच बताओ क्या ये पैसे देखकर तुम्हारे मन में ख्याल नहीं आ रहा कि नोट का एक बंडल भी पास होता, होगा भी नहीं तुम्हारे पास कभी क्योंकि तुम्हारे पास बेचने को है क्या ? तुम जिस ईमान को बेशकीमती बताये बैठे हो, उसकी कीमत है क्या ? ईमान की कीमत पद और ओहदे से होती है, जितना बड़ा पद उतनी बड़ी कीमत. तुम तो चीख ऐसे रहे हो जैसे तुमने ही कोई खनन का बड़ा काम लिया था और ये पैसे तुमने दान में मैडम को दिये थे.   

अब लॉजिक दोगे कि वो हमारा पैसा है, मजदूरों का पैसा है, गरीबों का पैसा है, हमारा टैक्स, लट पट... भक    अच्छा बताओ, तो  क्या वो पैसा वहां नहीं होता, तो उतने पैसों की ढेरी होती तुम्हारे पास ?  वहां नहीं होता तो कहीं और होता लेकिन तुम्हारे पास तो इसकी फूटी कौड़ी नहीं होता. पैसे की ढेरी देखकर अफसोस मत करो, दुख मत जताओ और ज्ञान भी मत दो. तुम्हें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता और ना ही पड़ना चाहिए, अगर पड़ा भी तो क्या कर लोगे. चाय की टपरी पर चिल्लाओगे, फेसबुक पर ज्ञान बटोगे, सरकार की चिंता करोगे लेकिन तुमसे होगा कुछ नहीं. ना सरकार तुम्हारे कहने से गिरगी, ना सत्ता में बैठे मंत्री ना सरकारी अधिकारी बदलेंगे. बदलेगा कुछ नहीं तो बेकार का लोड मत लो. 

ज्यादा परेशान मत हो, थोड़ा और समझ लो चिंता कम होगी. जो तुम देख रहे हो वो उतना ही है जितना तुम्हारी पॉकिट में चिल्लर होते हैं, सत्ता की सच्चाई देखी कहां है तुमने जो हैरान हो रहे हो. सरकार, बड़े पद या कॉरपोरेट में कोई  दोस्त, रिश्तेदार या कोई अपना हो, तो पूछना उससे कि असल में सत्ता चलती कैसे है ? अगर कोई मिला तो ठीक नहीं मिला तो  तुम इस झूठी शान में जी रहे हो उसी भ्रम में मर भी जाओगे. 

सत्ता पाने, उसे चलाने के लिए जिन चीजों की आवश्यक्ता है ना, तुम कल्पना भी नहीं कर सकते. सच जो तुम देख रहे हो ना उससे कहीं ज्यादा काला है. सबके चेहरे पर कालिख है, बस देखने के लिए तुम्हारे पास वो आंखे नहीं है. कई बार इस कालिख की कोठरी से किसी को धक्के देकर इसलिए निकाल दिया जाता है ताकि उनकी कालिख दिखायी ना दे.  

ज्यादा समझाने की कोशिश तुमको बेकार है, क्योंकि तुम जो समझ रहे हो वो है नहीं, मैं जो समझा रहा हूं वो तुम समझोगे नहीं. तुम्हारी अधूरी समझ ने ही तुम्हें ना समझ बनाकर रखा है, तो वही बनकर रहो अक्सर गड़े खजाने और फेके हुए पैसे पाने का सपना देखने वाले तुम जैसे लोग समझेंगे भी कितना.

Jharkhand Power Crisis : सीएम के घर पेड़ पौधों के लिए भी बिजली और हमारे घर राष्ट्रीय समस्या का अंधेरा

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सीएम आवास 

 हम जैसे लोग जिनके घर में ना एयरकंडिशन है, ना ही इतना बड़ा घर की बागीचे में भी रौशनी चाहिए. एक बल्ब और पंखे के सहारे रात कट जाती है, बिजली की कटौती से ज्यादा परेशान हैं. आज बिजली कटी, तो शहर के एक चक्कर लगाकर लौटा हूं कि मेरी तरह कितने लोग हैं, जिन्हें इस राष्ट्रीय समस्या ने  परेशान  कर रखा है. सड़क के किनारे कई घरों में अंधेरा दिखा. कई जगहों पर लोग छत में, अपनी बालकनी में नजर आये. 


डीसी साहेब का घर 

सीएम हेमंत सोरेन ने ऐसे ही थोड़े ना इसे राष्ट्रीय समस्या बताया हैं. सकंट तो बड़ा है और गर्मी में लोग परेशान भी हैं. देखकर सीएम साहब की बातों पर भरोसा हुआ कि सच में समस्या बड़ी है. सोचा हम सभी घर की छत पर या बाहर अपने घरों में रौशनी के इंतजार में हैं, तो सीएम साहेब भी अपने परिवार के साथ बागीचे में टहलते या मोरहाबादी मैदान के चक्कर मारते मिल जायेंगे आखिर इस राष्ट्रीय समस्या से परेशान तो वो भी होंगे लेकिन ये क्या मुख्यमंत्री आवास पहुंचा, तो देखा कि हमारे हिस्से की रौशनी से तो इनका बागीचा रौशन हो रहा है. दरवाजे पर चमचमाती रौशनी ने साफ बता दिया कि ये इस राष्ट्रीय समस्या से बाहर हैं, अंदर पेड़ पौधों को भी पर्याप्त रौशनी मिल रही है. मुख्यमंत्री आवास के हर कोने में रौशनी है और हम अपने घर के एक कमरे में अंधेरे से परेशान हैं. क्या मुख्यमंत्री इस राषट्रीय समस्या का हिस्सा नहीं है.   

चीफ जस्टिस साहेब का बंगला

मुझे लगा कि भाई मुख्यमंत्री है संभव है इनके लिए अलग इंतजाम होगा. फिर मोरहाबादी में मैं राजकीय अतिथिशाला गया, वहां भी जगमग रौशनी फिर खुद को समझाया कि भइया अतिथि देवो भव :  और भगवान को कोई अंधेरे में थोड़ी ना रखता है.  इसके बाद मैं जिले के मालिक के घर से होकर गुजरा छवि रंजन सर के बाहर का बड़ा सा दरवाजा रौशनी में अपनी छवि तैयार किये बैठा था. बगल में मंत्री जी के आवास में भी रौशनी छनकर सड़क तक आ रही थी. सरकारी अधिकारी और अफसर भी इस

राष्ट्रीय समस्या का हिस्सा नहीं है. चीफ जस्टिस के आवास के पास भी गुजरा वहां भी बिजली की समस्या नहीं थी. आखिर इस राष्ट्र में इस राष्ट्रीय समस्या की जद में कितने लोग हैं और अगर देश के विकास में, देश के हर गर्व के क्षण में इनका हिस्सा है, तो फिर इस समस्या में क्यों नहीं है ? 

नेता जी चंपई सोरेन का घर 

हम अंधेरे में हैं और राज्य से बिजली तैयार होकर दूसरे राज्यों को जा रही है, तो हम इस राष्ट्रीय समस्या को हल करने में कितनी भूमिका निभा रहे हैं औऱ अगर सच में बिजली की इतनी किल्लत है, तो साहेब लोग के घर के साथ- साथ बड़े - बड़े बागीचे और आलीशान और शानदार लैंप जिनकी रौशनी की शायद किसी को जरूरत नहीं फिर जल कैसे रहे हैं. क्या इस राष्ट्रीय समस्या का हल भी हम जैसे साधारण औऱ आम लोगों के हिस्से की रौशनी छिनकर निकलेगा ? तकलीफ उसी को होती है जिसे दर्द होता है. 

इन्हें तो बिजली ना होने और अंधेरे में घंटों बिजला का इंतजार करने का दर्द ही नहीं पता. अगर सीएम, मंत्री औऱ सरकारी आवास में बिजली कटे और कभी- कभी रात भर ना आये तो इन्हें महसूस हो कि कैसे पेपर मोड़कर पंखा तैयार करके हौकते हुए रात कटती है, सुबह उसी उत्साह के साथ हम जैसे साधारण लोग अपने दफ्तर जाते हैं, काम करते हैं फिर वापस लौटकर इस राष्ट्रीय समस्या से भी लड़ते हैं.  

सिर्फ राशन कार्ड नहीं पेट्रोल सब्सिडी के लिए ये सब भी होना जरूरी है...

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अगर आपके पास भी राशन कार्ड है और आप झारखंड सरकार की तरफ से मिलने वाली पेट्रोल सब्सिडी लेने का मन बना रहे हैं, तो आपके पास दो चीजें होनी चाहिए. एक तो राशन कार्ड और दूसरा दमदार इंटरनेट वाला मोबाइल या लैपटॉप. अगर आपके पास राशन कार्ड है और आप यह आर्टिकल अपने मोबाइल या लैपटॉप में पढ़ रहे हैं, तो मुबारक हो आप योग्य है. 

पेट्रोल सब्सिडी के साथ- साथ राशन कार्ड को लेकर दूसरी खबरें भी चर्चा में है. झारखंड सरकार 1.83 लाख लोगों के राशन कार्ड रद्द करने की तैयारी में है. संभव है कि सरकार की इस पेट्रोल सब्सिडी योजना से और नाम भी सामने आयेंगे. पता चला कि लाल कार्ड वाले साहेब ने बुलेट के लिए सब्सिडी की मांग कर दी. आप भले ही इस योजना में बैठकर खामियां निकालिये लेकिन मुझे ऐसा लगता है जैसे सरकार गरीबों को लाभ देने के लिए नहीं बल्कि सक्षम लोगों से गरीबों के नाम से ली जाने वाली सुविधाएं छिनने के लिए है. 

अभी तक 55000 राशन कार्ड निरस्त किए गए हैं. 70,569 ऐसे लोगों की जांच चल रही है.   राज्य स्तर पर इसके लिए टास्क फोर्स के गठन पर भी विचार किया जा रहा है.  झारखंड सरकार के खाद्य आपूर्ति मंत्री रामेश्वर उरांव ने विधानसभा में बताया कि सरकार ऐसे लोगों की जांच करा रही है. 

 यह छूट आसानी से नहीं मिलने वाली. राशन कार्ड तो सिर्फ एक योग्यता है. इसके साथ- साथ  आपके पास अच्छा मोबाइल जिसमें इंटरनेट चलता हो, अंग्रेजी और हिंदी की अच्छी समझ के साथ- साथ मोबाइल चलाने में दक्षता हो, आधार कार्ड, बैंक अकाउंट नंबर, गाड़ी के जरूरी कागजात तैयार हों और इतना सब हो तो आप अपने राशन कार्ड का रंग जरूर देख लीजिएगा कि आप उस कार्ड के योग्य हैं भी या नहीं. 

इसमें हम आपकी थोड़ी मदद किये देते हैं झारखंड में तीन प्रकार के कार्ड है. लाल, पीला और हरा. 

APL Ration Card – एपीएल राशन कार्ड राज्य के उन लोगो के लिए जारी किया गया है जो गरीबी रेखा से ऊपर जीवन यापन कर रहे है । उन्हें  एपीएल श्रेणी में रखा गया है । झारखण्ड के लोग इस राशन कार्ड के लिए ऑनलाइन अप्लाई कर सकते है ।इस राशन कार्ड के लिए कोई आय निर्धारित नहीं की गयी है ।

BPL Ration Card – बीपीएल राशन कार्ड राज्य के उन लोगो के लिए जारी किये गए है जो लोग गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन कर रहे है ।गरीबी रेखा से नीचे आने वाले परिवारों की वार्षिक आय 10000 रूपये से नीचे होनी चाहिए  |

AAY Ration Card – यह राशन उन लोगो के लिए सरकार द्वारा जारी किये गए है जो लोग बहुत ही ज़्यादा गरीबी में जीवन यापन कर रहे है तथा कोई आय भी निश्चित नहीं है या आय ही नहीं है  वह इस राशन कार्ड के लिए आवेदन कर सकते है |

सवाल है कि बीपीएल और अंत्योदय कार्ड के लोगों के लिए यह योजना कितनी कारगर है. क्या इस कार्ड का उपयोग करने वाले लोग इतने सक्षम है कि वह झारखंड सरकार के इस तरीके का इस्तेमाल करके इसका लाभ ले सकेंगे. रामेश्वर उरांव ने बताया कि राज्य में 65 हजार ऐसे लोग ऐसे हैं जो धान भी बेच रहे हैं और राशन कार्ड का भी लाभ ले रहे हैं. जांच में यह पाया गया है कि इन्होंने 50- 200 क्विंटल से ज्यादा धान बेचा है. 

इनके राशन कार्ड को भी रद्द करने की तैयारी है. 3.38 लाख बीपीएल की श्रेणी में हैं जो लोग अयोग्य हैं और बीपीएल का लाभ ले रहे हैं बाकि सरकार की योजना है अगर आप इसका लाभ लेने के योग्य हैं तो घर बैठे 250 रुपये खराब नहीं है. 

टेलीप्राम्टर प्रधानमंत्री या प्रखर वक्ता नरेंद्र मोदी ?

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देश की राजनीति में प्रखर वक्ताओं की सूची बनायेंगे तो एक नाम नरेंद्र मोदी का रखना ही होगा.  मुझे नहीं लगता कि देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी टेलीप्राम्टर बंद हो जोने के बाद असहज हो जायेंगे. इसमें भी कोई दो राय नहीं है कि पीएम मोदी टेलीप्राम्टर का इस्तेमाल करते हैं. मैं पत्रकार हूं, नयी दौर की पत्रकारिता करता हूं मसलन लिखता भी हूं और दिखता भी हूं. 

कई बार हमें वीडियो बनाते वक्त अहम जानकारियां एक पेपर पर लिखकर साथ रखना पड़ता है.  इतना समझता हूं कि जरूरी आंकड़े, अहम जानकारियां हर बार याद नहीं रहते. हम उस नयी पौध से हैं जो छोटी गलतियों पर सोशल साइट में चटकारे लेना अच्छी तरह जानती है. भले ही इनमे से कुछ लोगों को मंच पर या भीड़ में खड़ा कर दें तो जबां कम पैर ज्यादा हिलेंगे.  

राहुल गांधी के कई भाषण सोशल मीडिया पर वायरल है, पप्पु नाम कई चुनावी सभाओं में भी विरोधियों के जरिये इस्तेमाल किये जा चुके हैं. राजनीति में अवसर की तलाश होती है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने  विश्व आर्थिक मंच (WEF) के दावोस अजेंडा शिखर सम्मेलन को संबोधित करने के दौरान यह मौका अपने विपक्षी पार्टी के लोगों को दे दिया है. 

एक अच्छे वक्ता की क्या पहचान है ? आपकी नजर में इसकी परिभाषा क्या है ? अटल बिहारी वाजपेयी अच्छे वक्ता थे लेकिन कई बार भाषण के वक्त लंबे समय तक चुप रहना( लंबा पॉज़ लेना )कई बार चर्चाओं में रहा. वाजपेयी हर 15 अगस्त को लाल किले से दिया जाने वाला भाषण पढ़कर देते थे. वाजपेयी के निजी सचिव रहे शक्ति सिन्हा से जब इस संबंध में सवाल किया गया तो उन्होंने बताया कि ''वह लाल किले की प्राचीर से कोई चीज़ लापरवाही में नहीं कहना चाहते थे. उस मंच के लिए उनके मन में पवित्रता का भाव था. हम लोग अक्सर उनसे कहा करते थे कि आप उस तरह से बोलें जैसे आप हर जगह बोलते हैं, लेकिन वह हमारी बात नहीं मानते थे.

साफ है कि आपका संबोधन जगह- जगह पर निर्भर करता है कि आप बगैर आंकड़े के बगैर फैक्ट के रैलियों में भाषण दे सकते हैं, अंतरराष्ट्रीय मंच पर नहीं. कुल मिलाकर बात ये कि राजनीति में इस तरह के अवसर की तलाश होती है. आप भी किसी खास पार्टी से जुड़े हैं, किसी खास नेता को पसंद करते हैं तो पक्ष और विपक्ष के इस खेल में शामिल रहिये चटकारे लेते रहिये. 

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